शतावर या शतावरी व इसकी औषधीय जानकारी ओर उपयोग

Shatvri & Its Drug Uses.




परिचय - सतावर अथवा शतावर (वानस्पतिक नाम  Asparagus racemosus / ऐस्पेरेगस रेसीमोसस) लिलिएसी कुल का एक औषधीय गुणों वाला पादप है। इसे 'शतावर', 'शतावरी', 'सतावरी', 'सतमूल' और 'सतमूली' के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत, श्रीलंका तथा पूरे हिमालयी क्षेत्र में उगता है। इसका पौधा अनेक शाखाओं से युक्त काँटेदार लता के रूप में एक मीटर से दो मीटर तक लम्बा होता है। इसकी जड़ें गुच्छों के रूप में होतीं हैं, शतावर के पौधे को विकसित होने एवं कंद के पूर्ण आकार प्राप्त करने में तीन वर्ष का समय लगता है



शतावरी भारत की शक्ति वर्धक जड़ी बूटियों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है या हमारे देश के प्रायः समस्त समशीतोष्ण और उन क्षेत्रों में तथा हिमालय की 4000 फीट की ऊंचाई एवं अरावली पर्वत श्रेणियों में बहुतायत से होती है सतावर के ऊपर चढ़ने वाली बेल नुमा कांटेदार लताएं होती हैं इसकी शाखा चारों ओर फैली होती है




आयुर्वेद में इसे ‘औषधियों की रानी’ माना जाता है। इसकी गांठ या कंद का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें जो महत्वपूर्ण रासायनिक घटक पाए जाते हैं वे हैं ऐस्मेरेगेमीन ए नामक पॉलिसाइक्लिक एल्कालॉइड, स्टेराइडल सैपोनिन, शैटेवैरोसाइड ए, शैटेवैरोसाइड बी, फिलियास्पैरोसाइड सी और आइसोफ्लेवोंस। सतावर का इस्तेमाल दर्द कम करने, महिलाओं में दूध की मात्रा बढ़ाने, मूत्र विसर्जनं के समय होने वाली जलन को कम करने और कामोत्तेजक के रूप में किया जाता है। इसकी जड़ तंत्रिका प्रणाली और पाचन तंत्र की बीमारियों के इलाज, ट्यूमर, गले के संक्रमण, ब्रोंकाइटिस और कमजोरी में फायदेमंद होती है। यह पौधा कम भूख लगने व अनिद्रा की बीमारी में भी फायदेमंद है। अतिसक्रिय बच्चों और ऐसे लोगों को जिनका वजन कम है, उन्हें भी ऐस्पैरेगस से फायदा होता है। इसे महिलाओं के लिए एक बढ़िया टॉनिक माना जाता है। इसका इस्तेमाल कामोत्तेजना की कमी और पुरुषों व महिलाओं में बांझपन को दूर करने और रजोनिवृत्ति के लक्षणों के इलाज में भी होता है।



विविध नाम :- संस्कृत – शतमूली, शतावरी, शतवीर्या आदि, हिंदी – शतावर, सितावर, के नाम से जाना जाता है .







गुणधर्म - सतावर शीतवीर्य, स्निग्ध, मधुर, कड़वी, रसायन, अग्नि दीपक, पोस्टिक, वीर्य वर्धक, बुद्धि वर्धक, कामोद्दीपक, बल कारक, प्रमेह, अतिसार नाशक, एवं शीघ्र ही वृद्धा अवस्था आने से बचाने रखने वाली है. वात संस्थान नर्वस सिस्टम, शुक्र निर्माण संस्थान, एवं गर्भाशय आदि नारी प्रजनन अंगों पर इसका प्रभाव पोषक तथा शामक होता है

हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों द्वारा किए गए परीक्षणों से प्रमाणित हुआ है कि शतावर का सेवन करने से नारी के स्तन बड़े हो जाते हैं उसमें दूध अधिक बनने लगता है.





सुप्रसिद्ध औषधि योग :- शतावरी चूर्ण, शतावरी घृत, शतावरी गुग्गुल, फल कल्याण घृत, शतावरी तेल, नारायण महानारायण तेल, शतावरी मोदक, शतावरी मंडूर आदि, इसके अतिरिक्त अनेक आयुर्वेदी योगों में सहयोगी औषधि के रूप में शतावरी का प्रयोग किया जाता है.




शतावरी के विविध प्रयोग अथवा उपयोग



नारी स्तन में दूध वर्धक योग - शतावर 20 ग्राम मोटा-मोटा कूटकर दूध 250 ML पानी 250 ML मिलाकर पकाएं जब पानी जल जाए तो दूध उतारकर छान लें और मिश्री या चीनी मिलाकर बच्चे वाली मां को पिलाएं यह एक मात्रा है ऐसी एक एक मात्रा केवल सुबह अथवा सुबह-शाम पिलाने से स्तनों में दूध खूब बढ़ जाता है साथ ही वह महिला शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ बनी रहती है और दूध पिलाने से आने वाली कमजोरी या प्रसव से आई चिंता भी दूर होती है.





पोषक स्वास्थ्य रक्षक एवं स्नायु शक्ति दाता चूर्ण - शतावरी सूखी हुई 300 ग्राम, असगंध 200 ग्राम, सोंठ 100 ग्राम कूट पीसकर चूर्ण बना ले , इसकी 1 चम्मच लगभग १० ग्राम मात्रा सुबह-शाम को १ गिलास दूध लगभग २०० ML या  1 गिलास जल से लें, गर्मियों में इसकी मात्रा चौथाई चम्मच के बराबर मिश्री के साथ ले, इसको लेते रहने से शरीर क्षीणता नहीं आने पाती, शरीर में रोगप्रतिरोधक शक्ति उत्पन्न होती है, यह शुक्र को गाढ़ा करके शक्ति प्रदान करता है.


स्वप्न दोष, धातु स्राव - शतावरी का चूर्ण 200 ग्राम, पिसी हुई मिश्री या चीनी 200 ग्राम मिलाकर रखें सुबह शाम एक से दो चम्मच तक दूध के साथ ले इसमें या शुद्ध घी 6 ग्राम मिलाकर सुबह-शाम खाने से स्वप्नदोष प्रमेह बैठता है तथा शरीर बलवान और सुंदर बनता है .


नपुंसकता, काम के प्रति उदासीनता आदि- शतावर, असगंध, कौंच के बीज, मूसली, और गोखरू को बराबर बराबर मात्रा (जैसे १०० -१०० ग्राम सभी) में लेकर कूट छानकर चूर्ण बना लें प्रतिदिन 4 से 5 ग्राम तक प्रातः एवं स्वयं को दूध के साथ खाएं, यह उत्तम वाजीकरण औषधि है इससे पुरुषों में नपुंसकता, काम के प्रति उदासीनता व मानसिक उदासीनता ठीक होती है, महिलाओं में भी कभी-कभी पुरुष संसर्ग से विरक्ति होकर मानसिक उदासीनता हो जाती है वह भी इसे ठीक होती है



शतावरी के किसी भी रूप में नियमित प्रयोग से शारीरिक मानसिक बल वृद्धि और नस नाड़ियों को शक्ति मिलती है










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