अडूसा (वासाका) और इसके औषधीय उपयोग
Vasaka, Adusa & its drug uses.
अड़ूसा भारत के प्राय: सभी क्षेत्रों में पाया जाता है । यह परम उपयोगी वन औषधि है, यह सभी जगहों, नदियों-तालाबों के किनारे स्वयं ही उग आता है । उत्तर प्रदेश, बंगाल, मध्य भारत तथा हिमालय के तराई क्षेत्रों में यह बहुतायत मे उगता है, खेतों, बगीचों, बागों, मकानों आदि के आस-पास इसको बाड़ के रुप में भी उगाया जाता है ।
अडूसे के हरे-भरे छोटे-छोटे पौधे शाखा-प्रशाखाओं से युक्त झाडीनुमा होते हैं । इसमें एक खास किस्म की गंध आती हे । इसका तना कठोर मजबूत होता है । जड़ के थोड़ा ऊपर से ही शाखाएं निकलती हैं, जो इसे झाडी का रूप देती हैं । इसकी पत्तियां 4 से 8 इंच तक लंबी और 1 इंच से 3 इंच तक चौडी होती हैं । पत्तियां आगे की और नुकीली होती हैं । इसके फूल शाखाओं के अगले भाग पर गुच्छों में लगते हैं और सफेद होते हैं । वसंत के मौसम में फूलों को तोड़कर पीछे की और से उन्हें चूसने पर वें मीठे लगते हैं । इनका रस मधूमबिखयां चूस ले जाती हैं । अडूसे का फ़ल लगभग पौन इंच लम्बा और इसका अगला भाग मोटा एवं पिछला भाग चपटा होता है
विभिन्न नाम – संस्कृत - बासक, वासा, हिन्दी - अड़ूसा, लेटिन - आढातोडा वासिका
गुण-धर्म - अडुसा लघु, रुक्ष, तिक्त, कसैला, हृदय को हितकर, शीत-बीर्य, स्वर के लिए लाभकारी, कृमि, स्वास, कास, क्षय, कफ, पित्त विकार, रक्तपित्त, ज्वर, विवर्णता, कामला, प्रमेह, अरुचि, प्यास, क्षयज कास और रक्तविकारों में उपयोगी है । यह कफ को निकालने वाला होता हे । इसके पुष्प कास, क्षय और कफ पित्त नाशक होते हैं । इसकी छाल और पत्ते आमनाशक, दीपक और रेचक होते हें । खाँसी, अजीर्ण, प्रसूता के विकार, बद्धकौष्ठता तथा ज्वर के बाद की शरीर की दुर्बलता के लिए अच्छा काम करते है । अड़ूसा की जड़ की छाल ज्वर नाशक, कफ निस्सारक तथा जीर्ण कफ विकृति से प्राप्त ह्रदय दुर्बलता मे उपयोगी है ।
आधुनिक खोजो के अनुसार आड़ूसा कफ निस्तारक, उत्तेजक, एंटिस्पास्मोडिक होता है । इसकी जड़ की छाल में वासीसिन नामक अत्यंत तिक्त क्रिस्टीलीय एलकेलाइड पाया जाता है । पत्तो में एढाटोडिरक एसिड एफ प्रकार का तैल, राल, शर्करांश तथा पीत रंजक तत्त्व पाए जाते है । यह स्वास नली शोध ब्रंकाइटिस, कास तथा स्वास रोगियों के लिए लाभदायक है ।
अड़ूसा के औषधीय प्रयोग - वासारिष्ट, वासकासव, वासावलेह, सीरप व्साका, वासा चन्दनादि तैल, वासा गुलकन्द, वासाक्षार, वासादि वटी एवं वासाचूर्ण आदि ।
विविध प्रयोग तथा उपयोग
खाँसी - अडूसे के छाया में सुखाए हुए पत्ते 1 0 0 ग्राम, मिश्री 100 ग्राम अच्छी तरह चूर्ण करके रख लें । मात्रा-डेढ़ से 3 चाय के चम्मच दिन रात में 4 बार गुनगुने जल से । बन्चवों को आधी या चौथाई मात्रा देनी चाहिए ।
अडूसे के पीले-पीले ताजे पत्ते भभके में 3/4 भाग भर दें । भभके का चौपाई भाग खाली रहना चाहिए । भभके में पानी न डालें । फिर धीमी-धीमी आंच देकर इसका अर्क चुआ लें । जितना अडूसा अर्क निकले उसके बराबर इसमें शहद मिलाकर बोतल में बन्द करके रख लें । इसकी मात्रा 3 ग्राम से 6 ग्राम है । दिन में 3-4 बार इसे लेना चाहिए । बच्चो को आयु के अनुसार 1/2 ग्राम से 2 ग्राम तक पिलाया जा सकता है । इससे हर प्रकार की नई-पुरानी खाँसी, स्वास, जुकाम, बच्चों की काली खाँसी, क्षय वाली खांसी में बहुत फायदा होता हैं । अड़ूसा के ताजे पत्तो का रस 10 ग्राम कों 5 ग्राम शहद में मिलाकर पिलाने से घाड़ा बलगम पतला होकर निकल जाता है और स्वास का वेग भी केएम हो जाता है ।
शरबत अडूसा अडूसा के पीले पड़ गए पत्ते 200 ग्राम, पानी देड़ लीटर, चीनी डेढ़ किलो,
विधि यह है कि अड़ूसों के पत्तों को 24 घंटे तक पानी में भिगोकर रखें इसके बाद हल्की हल्की आंच पर इन्हें उबालें जब आधा पानी शेष रह जाए तो उतार कर ठंडा होने पर पत्तों को मसलकर छान लें और छ्ने हुए पानी में चीनी मिलाकर पकाकर शरबत की चाशनी बना लें इसकी मात्रा लगभग 5 ML से 10 ML दिन में 2 बार सेवन करें, दमा खांसी क्षय रोग की खांसी में रक्त आना आदि श्वास संबंधी रोगों में अत्यंत लाभप्रद है

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