पुनर्नवा की जानकारी और उपयोग
विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पुनर्नवा। हिन्दी- सफेद पुनर्नवा, विषखपरा, गदपूरना। मराठी- घेंटूली। गुजराती- साटोडी। बंगला-श्वेत पुनर्नवा, गदापुण्या। तेलुगू- गाल्जेरू। कन्नड़-मुच्चुकोनि। तमिल- मुकरत्तेकिरे, शरून्नै। फारसी- दब्ब अस्पत। इंग्लिश- स्प्रेडिंग हागवीड। लैटिन- ट्रायेंथिमा पोर्टयूलेकस्ट्रम। इसके पौधे सम्पूर्ण भारत पे पाये जाते है ।
पुनर्नवा संस्कृत के 2 शब्दों पुनः यानी फिर से और नव यानि नया से मिलकर बना हुआ है इसका मतलब हुआ कि नया जीवन, जी हां पुनर्नवा मानव शरीर को नया जीवन देने में मददगार है इसलिए इस औषधि का भारतीय समाज में बहुत बड़ा महत्व है इसके इस्तेमाल से कई सारे रोगों से शरीर मुक्त रहता है और हमेशा जवां रहता है ।
उपयोग – पुनर्नवा की जड़ व पंचांग औषधि मे प्रयोग होता है । यह 2 प्रकार की होती है सफेद ओर लाल । सफेद और लाल पुनर्नवा की पहचान यह है कि सफेद पुनर्नवा के पत्ते चिकने, दलदार और रस भरे हुए होते हैं और लाल पुनर्नवा के पत्ते सफेद पुनर्नवा के पत्तों से छोटे और पतले होते हैं। यह जड़ी-बूटियां बेचने वाली दुकान पर हमेशा उपलब्ध रहती है। इस वनस्पति का उपयोग शोथ, पेशाब की रुकावट, त्रिदोष प्रकोप और नेत्र रोगों को दूर करने के लिए विशेष रूप से किया जाता है।
आयुर्वेदिक योग पुनर्नवासव, पुनर्नवाष्टक, पुनर्नवा मण्डूर, पुनर्नवादिकवाथ, आदि में इसका उपयोग प्रमुख घटक द्रव्य के रूप में किया जाता है परीक्षणों से पीटीए चला है की पुनर्नवा की मूत्र विरेचक क्रिया गोखरू की आपेक्षा अधिक है।
गुण : श्वेत पुनर्नवा चरपरी, कसैली, अत्यन्त आग्निप्रदीपक और पाण्डु रोग, सूजन, वायु, विष, कफ और उदर रोग नाशक है । एक औषधीय पौधा वर्णित है जिसका शाब्दिक अर्थ है पुनरुत्थान और इसी चीज़ के लिए इस पौधे का उपयोग किया जाता है। पुनर्नवा शरीर में संचित मलों को मल-मूत्रादि द्वारा बाहर निकालकर शरीर के पोषण का मार्ग खुला कर देती है ।
बुढ़ापे में शरीर में संचित मलों का उत्सर्जन यथोचित नहीं होता । पुनर्नवा अवरूद्ध मल को हटाकर हृदय, नाभि, सिर, स्नायु, आँतों व रक्तवाहिनियों को शुद्ध करती है, जिससे मधुमेह, हृदयरोग, दमा, उच्च रक्तदाब आदि बुढ़ापे में होनेवाले कष्टदायक रोग उत्पन्न नहीं होते ।
यह हृदय की क्रिया में सुधार लाकर हृदय का बल बढ़ाती है । पाचकाग्नि को बढ़ाकर रक्तवृद्धि करती है । विरूद्ध आहार व अंग्रेजी दवाओं के अतिशय सेवन से शरीर में संचित हुए विषैले द्रव्यों का निष्कासन कर रोगों से रक्षा करती है
सूजन में पुनर्नवा का उपयोग -परीक्षणों से सिद्ध हो गया है कि पुनर्नवा के प्रयोग से मूत्र की मात्रा में पर्याप्त वृद्धि होती है, हृदय का कार्य व्यवस्थित हो जाता है एवं धमनियों में रक्त संचरण बढ़ जाता है फलता शोध दूर हो जाता है, शरीर को बल भी प्राप्त होता है, पुनर्नवा पंचांग 20 से 40 ग्राम लेकर 8 गुने जल में मिलाकर पकाएं जब चौथाई भाग बच्चे तो उतार कर छान कर दो मात्रा बना ले, इसमें 1 ग्राम सोंठ चूर्ण मिलाकर प्रातः शाम पिए, यह प्रयोग किसी भी कारण से आए स्थानिक शोध में अत्यंत हितकर है शोध में नमक का प्रयोग नहीं करना है।
पीलिया में पुनर्नवा का प्रयोग- पुनर्नवा की जड़ लाकर धूल मिट्टी से साफ कर लें और उसके छोटे छोटे टुकड़े काट लें फिर 8 या 9 कच्चे धागों को मिलाकर एक डोरी बना ले इस डोरी में उपरोक्त बूटी के एक-एक टुकड़े को थोड़े-थोड़े अंतर से गांठ लगाकर बांध दें इस प्रकार 20-21 टुकड़े बांधने से माला बन जाएगी, इसे पीलिया रोगी के गले में पहना देते हैं, कहा जाता है कि जैसे-जैसे रोक घटता जाता है वैसे वैसे माना बढ़ती जाती है लोगों के पूर्ण स्वस्थ हो जाने पर माला को किसी वृक्ष पर डाल देना चाहिए।





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