उपवास क्या है ? इससे जुडी जानकारी ओर भ्रांतियाँ

What is fasting?  Information related to fasting  & misconceptions or Illision.



में आपको उपवास क्या है, कैसे करतै है, और इसका क्या महत्त्व है व कब करना चाहिए व कब नहीं करना चाहिए इन सबकी जानकारी में आपको दूंगा.  



सबसे पहले ये जान लें कि उपवास का अर्थ है 'प्रत्येक प्रकार के आहार का सम्पूर्ण त्याग करना‘

सामान्यत: प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन आहार ग्रहण करता है जिससे उसका जीवन सुचारु रूप से चलता है किंतु जिस दिन व्यक्ति किसी भी प्रकार का आहार ग्रहण नहीं करता, उस दिन उसने उपवास किया है, ऐसा कहते हैं ।



उपवास का अर्थ "भूखो मरना" नहीं है । 
उपवास और भुखमरी दोनों अलग-अलग परिस्थितियाँ है । ये सच है कि दोनों परिस्थितियों में अन्न ग्रहण नहीँ किया जाता है । उपवास एक ऐसी प्रकिया है जिसे व्यक्ति स्वयं अपनी इच्छा से करता है जबकि भुखमरी अन्न के न मिलने कं कारण या गरीबी कं कारण उत्पन्न होती है । 




उपवास एक प्राकृतिक चिकित्सा है जिसकं करने से मनुष्य स्वास्थ्य प्राप्त करता है । उपवास से केवल  स्वास्थ्य की प्राप्ति ही नहीं होती, वल्कि कुछ जटिल रोगों की चिकित्सा भी उपवास के द्वारा सम्भव है । कई  लोगों को ये भ्रान्ति रहती है कि उपवास से खून की कमी हो जाती है. कमजोरी या चक्कर आते है, ये सब गलत बाते है । में आपको ये बता दूं कि ‘आहार बंद करने से मानव नहीं, किन्तु मानव कें अन्दर छुपा हुआ रोग भूखो मरता है' यदि किसी बीमार व्यक्ति को हम गरिष्ठ भोजन खाने को दें तो वह उसे शक्ति व ताकत प्रदान करने के स्थान पर बीमारी को शक्ति व ताकत प्रदान करेगा ।इससे बीमारी घटने की बजाय और बढ़ जायेगी । 

उदाहरण- हमारे आसपास अनेक पशु-पक्षी रहते हैं, यदि हम उनका अध्ययन करें तो हमे ये पता चल जाता है कि पशु पक्षी भी बीमार होते हैं तो उस समय सबसे पहले वह आहार का त्याग करतें हैं । उनके सामने चाहे उनकी पसंद का आहार ही क्यों न रखें लेकिन वह नहीं खाते हैं और ऐसा वह (पशु या पक्षी) तब तक करते हैं जब तक वह अपने आप को स्वस्थ्य महसूस नहीं कर लेते । इस प्रकार आहार ग्रहण न करके बिना दवाओं के वह रोगमुक्त हो जाते है । हम कह सकते है कि जानवर प्रकृति के नियमों का पालन करते  हुये स्वस्थ रहते है । 


उपवास में पेट को पूर्णत: विश्राम देना होता है ।



जेसे :-यदि किसी के घर कोई व्यक्ति बीमार होता है तो उस घर में रहने वाले प्रत्येक प्राणी के नियमित कार्य में बदलाव आ जाता है यानि कि उस घर में रहने वाले प्राणी किसी न किसी रूप में उस बीमार व्यक्ति की सेवा में लग जाते हैं । उसी प्रकार जो स्वस्थ व्यक्ति है यदि वह बीमार है तो उसकं शरीर के प्रत्येक अंगों के नियमित कार्यों में विघ्न उत्पन्न होता है और उन अंगों को अपने नियमित कार्यों में बदलाव करके उस अंग विशेष (जो रोगग्रस्त है) की सेवा में अपनी सम्पूर्ण शक्ति को लगाना पडता है जिससे उसके नियमित कार्यं में बाघा उत्पन्न होती है और ऐसे में भी हम यदि अपना नियमित सम्पूर्ण आहार लेंगे तो वह नुकसानदायक रहेगा, क्योंदि बीमारी के समय शरीर की संपूर्ण शक्ति रोग के साथ संघर्ष करने मे लगी रहती है । इस कारण बीमारी में भूख नहीं लगती है । ऐसे समय ' में उपवास कर शरीर से विषेले व विजातीय तत्वों को बाहर निकालना चाहिए। इससे रोगी जल्दी से रोगमुक्त हो जाता है ।



उपवास भी कई प्रकार से किए जाते हैं। जैसे

1. फलाहारी उपवास:… इसमें फल खाये जाते हैं ।

2. रसाहारी उपवास इसमें फलों का रस या तरल पदार्थ लिए जाते हैं ।

3. जलाहारी उपवास इसमें सिर्फ पानी व नींबू पानी देते है. यह ज्यादा से ज्यादा 2 दिन तक करना चाहिए.



उपवास निम्नलिखित परिस्थितियों में नहीं करना चाहिए ।



1. गर्भवती माता – इस समय माता और उसके गर्भस्थ शिशु को पोषण की अत्यधिक आवश्यकता होती है । इस कारण इस काल में माता को उपवास न करके हल्का व पौष्टिक भोजन ग्रहण करना चाहिए ।



2. मधुमेह रोगी - मघुमेह रोगी को उपवास नहीं करना भोजन समय पर न करने से शर्करा की मात्रा कम हो जाती है व चक्कर आने लगते है ।



{ज्योतिष शास्त्र कं अनुसार भी यदि किसी व्यक्ति का कोई ग्रह भरी हो तो उस ग्रह की शांति के लिए उस ग्रह से सम्बन्धित उस दिन की पूजा करवा कर उपवास रखने को कहा जाता है ।

उदाहरण:-  शनि ग्रह के लिए शनिवार के दिन व्रत या सूर्यं उपासना के लिए रविवार के दिन उपवास आदि करना शुभ-शांति के लिए फलदायक होते हैं}



हमारे पूर्वज ये वात अच्छी तरह से जानते थे कि सप्ताह में कम से कम एक बार पेट को हल्का रखने के लिये कोई भी आहार ग्रहण नहीं करना चाहिए । इस कारण आने वाली पीढियों को समझाने के लिए उपवास को धार्मिक रूप दिया होगा जिससे इसी बहाने मानव जाति रोगमुक्त व स्वस्थ रह सके । हमारे भारतवर्ष में शायद यही कारण है कि हर मा में दो-तीन धार्मिक त्यौहार ऐसे होते हैं, जिनमें ब्रत-उपवास रखा जाता है ।



इस प्रकार व्रत-उपवास का शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक महत्व है । हमे सप्ताह में कम से कम एक उपवास रखना चाहिए । ताकि इसी बहाने हम स्वास्थ्य लाभ पा सकें।

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